A Chronicle of Enlightened Citizenship Movement in the State Bank of India

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Monday, November 1, 2010

जंगल में मंगल

सफलता की यह कहानी की शुरुआत उस बियाबान जंगल से शुरू होती है जहाँ ७० से अधिक शेर खुले आम घूमते -फिरते है ,हजारों की तादात में हिरणों के झुण्ड अठखेलियाँ लेकर हवा में ग़ुम होते है , मेघों की गरज के साथ हजारों मोर-मोरनी के जोड़े नाचते नजर आते है , ११२० वेर्ग किलोमीटर में फेले इस बियाबान जंगल में दुनिया के पहले सफ़ेद शेर ने डरती पैर यहीं पहला कदम रखा था , ........ हाँ , यही है दुनिया का प्यारा -निराला नेशनल पार्क बांधवगढ़ जहाँ टाइगर रिजर्व के कोर इलाके में बैगा -गोंड जाति के लोगों के घास-फूस के टोले बसे होते है एवं हमेशा ही इन घरों में घुस कर शेर अपना शिकार करता है इनके गाय- बकरी ग्घर से उठा लेना उसकी आदतों में शुमार होता है ।

ऐसे बियाबान जंगल में पी -सेगमेंट में रुपया १४२० लाख का जमा संग्रहण की सफलता की कहानी कुछ इस तरह से शुरू होती है........ बैंकिग में जब गला-काट प्रतिस्पर्धा का दोर चल रहा हो और पी-सेगमेंट जमा के टार्गेट हासिल करने में एडी-चोटी करने के बाद पसीना आ रहा हो तब सच्ची लगन ,सोच में परिवर्तन एवं आत्म-विस्वास के साथ सुन्दर ग्राहक सेवा से सभी कुछ हासिल किया जा सकता है , इसका आभास स्टेट बैंक उमरिया का देखिये ----

प्रदेश के सबसे पिछड़े आदिवाशी इलाके उमरिया जिले में बियाबान जंगल से २-४ माह में रुपया १४२० लाख जमा एकत्र कर लेना इस बात को साबित करता है कि,
"सोच बदलो सितारे बदल जायेगें ,
नजर कोबद्लो नज़ारे बदल जायेगें ,
कश्तियाँ बदलने की जरूरत नहीं ,
दिशाओं को बदलो किनारे बदल जायेगें ,"

टार्गेट हासिल करके कुछ नया कमल कर दिखाना , निरंतर समर्पण भाव से ग्राहकों की सेवा करने में निहित है ,पी-सेगमेंट में दुसरे प्रतिद्वंदी बैंक से रुपया १४२० लाख छुड़ाकर अपने बैंक में लेन की सफलता की कहानी हमारे बैंक की ताकत और हमारी तरक्की की तस्वीर है । अवसर बार-बार नहीं मिलते , जब अवसर मिले तो सच्ची लगन एवं समर्पण भाव से मिले अवसर को हथिया लेना ,सफल होने की निशानी है । नए साल में अपने महत्वपूर्ण ग्राहकों को बहुत अपनेपन के भाव से उनके ओफ्फिस या घर में शुभकामनायें देने से शाखा के तरक्की के दरवाजे कुछ इस तरह से खुले , बांधवगढ़ नेशनल पार्क के प्रोजेक्ट ऑफिसर श्रीपाटिल ने नए साल की शुभकामनाओं के साथ रूपये १४२० लाख का तोहफा दे दिया ।

श्री पाटिल ने बताया कि टाइगर रिज़र्व में मानव जाती का दिअरेक्ट जीविक हस्तछेप न रहे एवं वन्य प्राणियों के अस्तित्व के संकट से उन्हें उबरने के लिए सर्कार ने यह कदम उठाया है कि वन्य प्राणियों के बचाव एवं संम्वर्धन के लिए यह आवशक है कि कोर एरिया में बसी मानव जाति का पुनर्वास कर कोर एरिया को जीविक दबाब से मुक्त किया जावे ,इसलिए कोर एरिया में बसे हर गाँव के हर परिवार को एक मुस्त रूपये १० लाख कि रहत राशी दी जाये ,मानपुर ब्लाक के कल्ल्वाहः

एवं कुम्र्वाहः गाँव के करीब १४२ परिवारों को उनके गाँव में ही बैंकिंग सुविधाएँ दे जाकर रुपया १४२० लाख एकत्र किये गए , प्रोजेक्ट के प्रथम चरण में बियाबान जंगल में बसे कल्ल्वाहः गाँव एवं कुमार्वाहः गाँव में उमरिया शाखा की टीम के श्री मल देवांगन , श्री शांतनु दो और लवकेश सिंह ने डेरा डाला ,प्रोजेक्ट ऑफिसर श्री पाटिल और एनी अधिकारी भी साथ हो लिए ,बैगा और गोंड जाति के परिवारों से गहरी आत्मीयता एवं विश्वास के साथ बैंक वालों की बैठकें हुई गांववालों को जमा योजनाओं के फायदे बतेये गए ,शाखा कि टीम ने उनकी भाष्हा और उनकी सभ्यता को सम्मान देते हुए बहुतही अपनेपन के भाव से उनके दिलों में स्थान बनाया ।

प्रोजेक्ट के दुसरे चरण में शाखा की टीम ने प्रोजेक्ट ऑफिसर कि अनुमति लेकर कल्ल्वाहः और कुमार्वाहः गाँव के परिवारों के खाते खोले और पास बुकों का वितरण किया जिसमे जिला प्रशन के आधिकारियों ने भाग लिया और ट्रेजरी से चेक जरी होने के साथ रूपये १० लाख के सावधि जमा के रसीदें जरी कि गईं , उनके सभी कार्यों के निबटान तुरंत किये गए , इन सभी कार्यों में रिजनल ऑफिस के श्री जे दी मजुमदार समप्र , श्री आर रघुरमण ,श्री वसंत खादायत और अस्बीई ग्रामिन्स्वा-रोजगार इंस्टिट्यूट उमरिया के निदेशक श्री जय प्रकाश पाण्डेय का विशेष योगदान रहा ।

पुरे प्रोजेक्ट को सफल बनाने में अनेक दिक्कतों का सामना करने का होसला बुलंदी पर था और मनोबल बढ़ाते हुए इस काम से सभी को अहसास हुआ कि .......
" आखों में मंजिलें थीं ,
गिरे और सभालते रहे ,
आधियों में क्या दम था ,
चिराग हवा में भी जलते रहे , "


जय प्रकाश पाण्डेय
निदेशक ,
ग्रामीण स्व-रोजगार ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट
उमरिया
मो- 9425852221

Friday, October 1, 2010

gandhi ji tum kyu yad aaye

गांधीजी आज हमारे बीच होते तो देश की मौजूदा दोहरी शिक्षा नीति का अवश्य ही खुला विरोध करते । आज देश में दो समांतर शिक्षण व्यवस्थाएं चल रही है, एक अंग्रेजी आधारित व्यवस्था जिसे येनकेन प्रकारेण अपने पूरी आमदनी लगाकर बच्चों के लिए अपनाने को अधिसंख्य लोग विवश हैं, तो दूसरी ओर वह व्यवस्था है जो समाज के कमजोर असंपन्न लोगों के लिए बची रह जाती है, जहां शिक्षा के यह हाल हैं कि प्राथमिक स्तर पार कर चुकने के बाद भी अनेकों बच्चे अपना नाम क्षेत्रीय भाषा माध्यम में भी लिख नहीं सकते हैं ।
अंग्रेजी स्कूल खुलकर भारतीय भाषाओं का विरोध नहीं करते हैं, किंतु वहां यह परोक्ष संदेश अवश्य मिलता है कि अपनी भाषाओं की कोई अहमियत नहीं है, और यह कि अंग्रेजी के बिना व्यक्ति और देश आगे नहीं बढ़ सकते हैं । जिस अंग्रेजी के संदर्भ में गांधी को यह कहते बताया जाता है कि “दुनिया को बता दें कि गांधी अंग्रेजी नहीं जानता है ।” उसी अंग्रेजी को अब अपरिहार्य घोषित किया जा रहा है । ठीक है कि अंग्रेजी की स्वयं में अहमियत है – खास अहमियत है – लेकिन इस तथ्य को भुलाया नहीं जा सकता है कि यह सामाजिक विभाजन का एक कारण भी बन रहा है । देश आज संपन्न ‘इंडिया’ एवं पीछे छूटते ‘भारत’ में बंट रहा है । समाज वैसे ही तरह-तरह से बंटा है, और यह एक अतिरिक्त विभाजक समाज में प्रवेश में कर चुका है । समाज में एक ऐसा वर्ग जन्म ले रहा है जिसका तेजी से पाश्चात्यीकरण हो रहा है, और जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कटता जा रहा है । महात्मा गांधी के लिए अवश्य ही आज की स्थिति विचलित करने वाली होती । तो क्या इन बातों पर विचार नहीं होना चाहिए ?

---jai prakash pandey
sbi- rseti ,umaria

बापू कि बर्थडे

रोज़ की तरह आज भी बापू याद आ रहे हैं। उनकी बर्थडे तो खैर एक वजह है ही, मगर इस बार उनकी याद और भी ज्यादा शिद्दत से आ रही है क्योंकि शायद इतने सालों में पहली बार खुद बापू को हम लोगों की ओर से मिलने वाली बर्थडे गिफ्ट बहुत पसंद आ रही होगी। उनके ईश्वर अल्लाह ने अपने बन्दों को जो सन्मति दी है, जिसके चलते अच्छे खासे तनाव के बाद भी उनके हिंदुस्तान में अमन चैन बरकरार रहा है, वो शायद हम हिन्दुस्तानियों की ओर से पहली ईमानदार गिफ्ट होगी उनके बर्थडे पर। कहीं कहीं पर हमारे हाथों में शायद कुछ कुछ खुजली हुई होगी, पर बापू के उसी ईश्वर अल्लाह ने शायद फिर हमें यह भी सद्बुद्धि दे दी कि हाथों की खुजली मिटाने के चक्कर में यही हाथ टूट भी सकते हैं। ये देख के तो लगता है कि हम जैसे तैसे भी हों, हम ऐसे भी हैं कि हिंदी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा। जय हिंद.

नीलाभ कृष्ण खरे

Tuesday, September 21, 2010

' गठबंधन खुलि खुलि जाय ''

लघु कहानी

बिदा हुई बरसात , चूने सी सफेद धूप फेलने लगी सुबह से ..... वक़्त कुछ इसी तरह से चलता ही रहता है .... फांस किस तरह से रह - रहकर दिल के कोने में पडी चुभती रहती है , ये शायद 'तुम' नहीं जानते होगे , हाँ ..... उस दिन की ही तो बात है अचानक तुम्हारा फ़ोन आया तुमने मेरे घर का पता पूछा था और थोड़ी देर में ऑटो से मेरे घर को खोज लिया था , तुमने घंटी बजाई थी ...धडकते रेलमपेल मन के साथ बड़ी मुश्किल से दरवाजे की कुंडी मेरे हाथों से खुल पाई थी , मुझे अहसास है कि विगत ३२ . ३५ सालों से तुम मुझे कितना चाहते हो पर इस ढाई अक्षर की भावनाओं को तुमने कभी प्रकट नहीं होने दिया , न ही तुमने इन ३२ सालों में कभी मेरी आँखों में झांक कर देखा ... वक़्त के सफ़र में पीछे छूट जाते है अहसास , उनकी सजल स्मृति नम करती है मन और आखों को .......प्रेम एक नितांत व्यकिगत एवं आत्मिक अनुभूति है , उसे परिभाषित करने के दायरे में बंधना मुश्किल है ........दरअसल तुम भी तो जीवन भर शर्मीले बने रहे और में भी बनी रही शर्मीली ......., हाँ , मुझे याद है जब में ८वी क्लास में पड़ती थी तभी से तुम मुझे छुप छुप कर निहारते रहते थे ,............., संस्कार और संकोच में लिपटे दिन रात सरपट सरपट भागते रहे ....... में ब्याह कर इस तरफ चली आयी और .....तुम उस तरफ अकेले मुड गए .... पर मुझे पता है कि तुमने इन ३२ सालों में अपने दिल को कितना बड़ा बना लिया और मुझे यह भी पता है कि इन ३२ सालों में तुमने जितनी भी लम्बी और गहरी सांसे ली है उनमे तुमने मुझे ही पाया है ,.....शायद तुम्हे नहीं मालूम कि नारी का मन समुद्र से भी गहरा होता है , ... ब्याह भी हो जाता है , बच्छे भी हो जाते है , पर बचपन में दिल में उठी वह चाहत जीवन भर दिल के एक कोने में कुलबुलाती रहती है , तुम तो जानते हो न कि प्रेम कोई खेल नहीं एक उदात्त भावना है और यह भावना एक जलते हुए अलाव की तरह होती है जिसकी आंच इसकी मध्यिम मधिम गर्मी जीवन भर सुहावनी लगती है ,........ तुम्हारा भोलापन और 'तुम' हर साँस पर उपस्तित रहे आए..... न तुमने प्रकट किया न मेने ........ तुम्हे कैसे बताएं कि अंतरंगता को परिभाषित करना कितना कठिन होता है पर इसके साथ अटूट विश्वास जुड़ा होता है , तभी न हमेशा लगता रहता है कि जहाँ तक नजर जाती है उधर तक तुम ही तुम नजर आते हो ,......... तुम ३२ साल बाद मेरे घर आये , मेने बहुत औपचारिकता के साथ तुम्हे बिस्कुट चाय दी ,.... महिलायों की आदत के मुताबिक तुम्हारे बीबी , बल बचों की खोज परख ली और फिर इतने सालों बाद भी तुम्हे न चाहने का नाटक भी किया तुम थोडा हतास से हुए थे उस वक़्त ...........फिर भी चूँकि तुम इतने दूर से मेरे शहर में आये और तुमने मुझे खोज ही लिया तो यह भी जायज है कि तुम इस शनिवार को मेरे पति और बच्चों के साथ खाना खा सको , सो बहुत औपचारिकता के साथ मेने तुम्हे खाने को बुला लिया है ..........थोड़ी देर बाद तुम अपने होटल की तरफ चले गए थे ,...........जब शाम को पति जी थके हारेघर आये तो उन्हें इस आमन्त्रण के बारे में जब मेने बताया तो झट से वे बोले कि कोई बहाना कर देते है , तुन्हारी तबियत हमेशा ख़राब रहती है कहाँ इतना सारा खाना बना सकोगी ,................................., में चुप रही ..........थोड़ी देर को लगा धरती डोल रही है , ... ' तुम ' याद आये ....फिर याद आये ,.....हाँ बहुत याद आये और तुम्हारे साथ ज़माने भी याद आये ..............बाहर अँधेरा पसारने लगा था ,....... मन में जलते हुए अलाव एवं हाथ में गरम चाय लेकर में पति के सामने झुकी थी , पति जी थके थे पर धीरे से मुस्कराते हुए चाय का शिप लेने लगे थे ........ तभी चुपके से मेने तय किया कि जब कोई भी घर में नहीं होगा तब तुम्हे बुलाकर कुछ खिला दूंगी ,.......२५ साल से तो अभी तक पतिव्रता धर्म का पालन तो कर रही थी,......................
--जय प्रकाश पाण्डेय
उमरिया 

Sunday, September 5, 2010

Teacher's day




कबीर ने कहा है-


गुरु पारस को अन्तरो ,जानत है सब सन्त । वह लोहा कंचन करे, ये करि लेय महन्त॥

गुरु और पारस पत्थर में क्या अन्तर है ,इस बात को सब सन्त जानते हैं ।पारस लोहे को कंचन बना देता लोहे को पारस नहीं बना सकता ; लेकिन गुरु शिष्यको अपने समान महान बनाने का विशिष्ट कार्य करता है.

Wednesday, August 25, 2010

ऐसे आये थे गाँधी जी ..

जब मेरी शाखा प्रबंधक के रूप में नारायणगंज (जिला -मंडला ) में पदस्थापना हुई तो अचानक मुझे याद आया कि बहुत पहले मैने कहीं किसी किताब में पढ़ा था कि वर्ष १९३३-१९३४ में महात्मा गाँधी नारायणगंज की हरिजन बस्ती में पकुआ के घर आये थे , वहां से उन्होंने छुआछुत की बीमारी दूर करने का प्रयोग किया था , ये बात नारायणगंज पहुचने के बाद लगातार याद आती रही और लगता रहा की वह स्थान देखने मिल जाता जहाँ पर महात्मा गाँधी ने पकुआ के हाथ से पानी पिया था और हरिजन बस्ती में छुआछूत पर भाषण दिया था

जबलपुर के स्वतंत्रता सेनानी व्योहार राजेंद्र सिंह की नारायणगंज में मालगुजारी थी वहां बियाबान जंगल के बीच में उनकी पुराने ज़माने की कोठी थी । जब महात्मा गांधी १९३३-३४ में जबलपुर आये थे तो व्योहार राजेंद्र सिंह के अनुरोध पर वे उनके मालगुजारी गाँव एवं जंगल घुमने उनके साथ ६ डिसेम्बर १९३३ को नारायणगंज में आराम करने के बाद हरिजन बस्ती में पकुआ के घर जाकर स्थानीय सवर्णों को पकुआ के हाथों से पानी पिला कर छुआछुत की प्रथा को समाप्त करने का प्रयोग किया था ।

मैने स्टेट बैंक नारायणगंज में २००५ में शाखा प्रबंधक के रूप में कार्यभार लिया तो गांधी जी याद आये और याद आया उनका नारायणगंज प्रवास , तब से हम व्याकुल रहते कि कहाँ है वह जगह जहाँ गांधी जी बैठे थे ? परन्तु नई पीढी के लोग यह मानने कोराजी ही नहीं थे कि महात्मा गांधी नारायणगंज आये थे । जिससे भी हम पूछ- ताछ करते सभी को ये बातें झूठी लगती , नयी पीढी के लोग मजाक बनाते कि बैंक में इस बार ऐसा मेनेजर आया है जो नारायणगंज में महात्मा गांधी और कोई पकुआ को खोज रहा है । बस्ती में तरह -तरह के लोगों से पूछते- पूछते हम हैरान हो गए थे , किसी को पता नहीं था न कोई बताने को राजी था ।

एक दिन शाखा में बहुत लोग एकत्रतित थे मैं हॉल खाचा खच भरा हुआ था , एक फटेहाल ९५ साल की बुढ़िया जिसकी कमर पुरी तरह से झुकी हुई थी मजबूर होकर मेरे केबिन की तरफ निरीह नजरों से देख रही थी , नजरें मिलते ही हमने तुरंत उसे केबिन में बुलाकर बैठाया , पानी पिलाया चाय पिलाई वह गद -गद से हो गई उसकी आँखों में गजब तरह की खुशी और संतोष के भाव दिखे , उसकी ४००/ की पेंशन भी वहीँ दे दी गई , फिर आचक गांधी जी और पकुआ याद आ गए , हमने तुरंत उस बुढ़िया से पकुआ के नाम का जिक्र किया तो वह घबरा से गई उसके चेहरे में विस्मय और आश्चर्य की आजीब छाया देखने को मिली , जब हमने पूछा कि इस गाँव में कोई पकुआ नाम का आदमी को जानती हो ?तो हमारे इस प्रश्न से वह अचकचा से गई और सहम से गई कि क्या पकुआ के नाम पर बैंक में कोई पुराना क़र्ज़ तो नहीं निकल आया है तो उसने थोड़ी अनभिज्ञता सिदिखाई परन्तु वह अपने चहरे के भावों को छुपा नहीं पाई , धोखे से उसने कह ही दिया कि वे तो सीधे - साधे आदमी थे उनके नाम पर क़र्ज़ तो हो ही नहीं सकता ! में उचल पढ़ा था ऐसा लगा जैसे अपनी खोज के लक्ष्य तक पहुच गया , मैने तुरंत फेमस रसगुल्ला बुलवा लिया था और उसे चाय से खाने को कहा था।

गरीब हरिजन परिवार की ९५ साल की बुढ़िया के संकोच और संतोष ने हमें घायल कर दिया था हमने कहा कि पकुआ के नाम पर क़र्ज़ तो हो ही नहीं सकता , हम सिर्फ यह जानना चाहते है कि इस्गओं में कोई पकुआ नाम का आदमी रहता था जिसके घर में ७५ साल पहले महत्मा गांधी जी आये थे , हम यह सुनकर आवक रह गए जब उसने बताया कि पकुआ उसके ससुर (फाठेर इन ला )होते है , उसने बताया कि उस ज़माने में जब पकुआ की ढपली बजती थी तो हर आदमी के रोंगटे खड़े हो जाते थे ,पकुआ हरिजन जरूर था पर उसे गाँव के सभी लोग प्यार करते थे ,गाँव में उसकी इज्जत होती थी बस ये बात जरूर थी कि छुआ-छुट का इतना ज्यदा प्रचलन था कि जहाँ से पकुआ ढपली बजाते हुए निकल जाता था वहां का रास्ता बाद में पानी से धोया जाता था , उस ज़माने में हरिजनों को गाँव के कुए से पानी भरने की इजाजत नहीं होती थी , जब मैने उस से पूछा कि ७५ साल पहले आपके घर कोई गांधी जी आये थे क्या ? तब उसने सर ढंकते हुए एवं बाल खुजाते हुए याद किया और कहा हाँ कोई महात्माजी तो जरोर आये थे पर वो महात्मा गांधी थे कि नहीं ये नहीं मालूम ! 
मैने पूछा कि क्या पहिन रखा था उनोने उस समय ? तब उसने बताया कि हाथ में लाठी लिए और सफेद धोती पहिने थे गोल गोल चस्मा लगाये थे , उस समय उस महात्मा ने गाँव में गजब तमाशा किया था कि पकुआ के हाथ से सभी सवर्णों को पानी पिलवा दिया था , सबने बिना मन के पानी पिया था और कुछ को तो उल्टी भी हो गई थी बाद में हम ही ने सफाई की थी , में दंग रह गया था मुझे ऐसा लगा मैने बहुत बड़ी जंग जीत ली है , साल भर से गली- गली गाँव भार में सभी लोगों से पूछता था तो सब मेरा मजाक उधाते थे , आज मैने उस किताब में लिखी बैटन को सही होते पाया , मैने उस दादी से सभी तरह की जानकारी ले डाली उसने बताया था कि ७५ साल से हमारा परिवार भुखमरी का जीवन जी रहा है हम सताए हुए लोग है आप को ये क्या हो गया जो हमारी इतनी आव-भगत कर रहे है आज तक किसी ने भी हमारी इतनी परवाह नहीं की न ही किसी ने हमे मदद की कल रत की रोटी का जुगाड़ हो पता है या नहीं ऐसी असंभव भरी जिन्दगी जीने के हम आदी हो गए है , लड़के बच्चे पैसे के आभाव में पढ़ नहीं पाए थोड़ी बहुत मजदूरी कर के गुजरा चलता रहा है एक होनहार नातिन जरूर है जो होशियार है अभी एक राज्य स्थर की खेल प्रतियोगिता में पैसे के आभाव में भाग नहीं ले सकी , राजधानी खेलने जाना था पर ,
अचानक मुझे यद् आया कि हमारे प्रिय चेयरमेन साहेब जी ने होनहार गरीब बच्चियों को गोद लेकर उनके हुनर को खोज कर उनके होसले बुलंद करने की एक योजना " गिर्ल्स अदाप्तेसिओं स्कीम " निकली है मैने तुरंत अपने स्टाफ को उस दादी के घर भेज कर उसकी नातिन नेहा ह्थाले को बुलाया , और तुरंत नियंत्रक से दूरभास पर बात कर के नेहा को इस योजना में शामिल कर लिया , उनके चेहरों में आयी खुशी को देख कर मुझे पहली बार महसूस हुआ कि वास्तव में खुशी का चेहरा कैसा होता है , मुझे गांधी जी और पकुआ लगातार याद आ रहे थे कोई स्थानीय पत्रकार को इसकी भनक लग गई और उसने यह समाचार शहर भेज दिया गांधी जी की रोती हुई तस्वीर के साथ पूरा समाचार फेमस अखवारों में छपा यह खबर पढ़ कर ई -टीवी वाले आ गए , ई -टीवी ने कव्रागे कर ह्य्द्राबाद खबर भेज दी ई- टीवी के न्यूज़ चेनेल ने सभी भाष्हों में इसे प्रसारित किया , सेन्ट्रल आफिस कि प्रयास पत्रिका ने भी इस खबर को छपा और चरों तरफ स्टेट बैंक की खूब प्रशंशा हुई कि जिस हरिजन परिवार में ७५ साल पाहिले गाँधी जी आये और जो परिवार ७५ साल से भुखमरी का जीवन जी रहा था उस परिवार की होनहार बेटी को सबसे पहले स्टेट बैंक ने मदद कर उसके प्रगति के द्वार खोले , तब मुझे पूर्ण विश्वास हुआ कि नारायणगंज में "ऐसे आये थे गांधी जी "..

-जय प्रकाश पाण्डेय
director, 

rural self employment training institute,
umariya (m.p.)
mob. 9425852221

jppandey121@gmail.com

Monday, May 17, 2010

स्वयं सहायता समूह


महिलाओं के सशक्तिकरण हेतु महिला एवं बाल विकास विभाग, मानव संसाधन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा विभिन्न कार्यक्रम चलाये जा रहे है, इनके अन्तर्गत स्वयं सिद्धा, स्वशक्ति, समेकित महिला सशक्तिकरण एवं विकास परियोजना, हरियाणा, स्टेप प्रोग्राम, स्वावलम्बन, महिला विकास एवं सशक्तिकरण हेतु दूरस्थ शिक्षा, किशोरी शक्ति, राष्ट्रीय महिला कोष के अन्तर्गत प्राविधान, बालिका समृद्धि योजना, स्वाधार तथा सहयोगी सेवायें जैसे- कामगार महिलाओं हेतु छात्रावास/आवासीय सुविधायें इत्यादि। महिलाओं को प्रोत्साहित करने हेतु अनेक पुरस्कार योजनायें भी संचालित की जा रही है, जैसे- स्त्री शक्ति पुरस्कार योजना। इसके अतिरिक्त अनेको कानून बने है जो महिलाओं को संरक्षा प्रदान करने हेतु चल रहे है। महिला सशक्तिकरण से आशय है-महिलाओं का शारीरिक, सामाजिक, मानसिक, भावनात्मक, आर्थिक एवं आध्यात्मिक रूप से सुदृढ़ होना। वर्तमान में महिलाओं को आर्थिक रूप से सुदृढ़ व आत्मनिर्भर बनाने के लिये महिलाओं को छोटे-छोटे समूहों में गठित कर नियमित बचत द्वारा बैंक से सम्बद्ध किया जा रहा है। जहाँ महिलायें अपनी सूक्ष्म मासिक बचत को प्रतिमाह सामूहिक रूप से एकत्र कर बैंक में अपने समूह के नाम खाते में जमा करती है। इस धनराशि में आवश्यकता पड़ने पर अपने समूह के सदस्यों को सामूहिक निर्णय से ऋण देती है। यह ऋण ब्याज़ अथवा बिना ब्याज़ के समूह की सदस्याओं को आवश्यकता पड़ने पर प्राप्त होता है। सामान्यतः इन समूहो की ब्याज की दर भी सूक्ष्म होती है तथा ऋण संबंधी आवश्यकता तुरन्त पूरी हो जाती है, जिससे महिलायें आर्थिक रूप से अपने छोटे-छोटे कार्यो को सम्पादित करती है। यह कार्य पारिवारिक हित के ही होते है जैसे- बच्चे के स्कूल की फीस, पति के कार्य हेतु धन, स्वयं कार्य करने हेतु धन इत्यादि। इन समूहों के माध्यम से महिलायें आर्थिक क्रियाकलापो को सरलता से पूर्ण कर लेती है तथा अपने छोटे से समूह में आत्मनिर्भरता का अनुभव करती है।



स्वयं सहायता समूहों की महिला सशक्तिकरण में भूमिकास्वयं सहायता समूहों की महिला सशक्तिकरण के विभिन्न पहलुओं में भूमिका निम्नांनुसार ऑकी जा सकती है।
शारीरिक स्वास्थ्य जो अन्य समस्त क्रियाकलापो का आधार है, उसे बढ़ावा देने में महिला स्वयं सहायता समूहों की अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका है। ग्राम्यस्तर पर संचालित समस्त स्वास्थ्य कार्यक्रमों में महिला समूहों की भागीदारी उनका स्वयं सेवक के रूप में स्वास्थ्य कार्यकताओं के साथ भूमिका निभाना जैसे- पल्स पोलियो अथवा एड्स जागरूकता कार्यक्रमों में ग्राम समूहों का भाग लेना तथा महिलाओं को स्वास्थ्य संबंधी सुविधायें जुटवाने में सहायता करना एवं उनमें जागरूकता लाना। इस प्रकार स्वयं सहायता समूह महिलाओं को शारीरिक रूप से सशक्त करने में सक्षम है।
इन समूहों में गठित यह महिलायें अपनी मित्र महिलाओं के साथ विचारो का आदान-प्रदान कर अपने विचारो में स्वीकृति प्राप्त करती है। निर्णय लेते समय कार्य-कारण की खोजबीन करती है। अपनी मित्र महिलाओं के कार्यो में अपनी स्वीकृति प्रदान करती है अथवा अपने निर्णयों मे उनकी स्वीकृति प्राप्त करती है। इस तरह उनकी विचार शक्ति, विचारो का आदान प्रदान, एक विचार के विभिन्न पहलुओं को देखने की शक्ति जो विभिन्न मित्र महिलाओं की भागीदारी से आती है, पनपती है, जिससे उनमें बौद्धिक सशक्तता आती है।

इन समूहों में गठित महिलायें सामाजिक स्तर पर भी अपनी प्रभावशाली भूमिका को पहचानना सीखती है। मित्र महिलायें मिलकर सामाजिक कुरूतियों का बहिष्कार कर अपने समाज से पिछड़ेपन के कारणो को दूर करने में सहायक होती है जैसे- शराबखोरी, जुआ, दहेज प्रथा, बाल विवाह और अनेको ऐसी समस्यायें जिनके कारण महिलायें त्रासित रहती है। यह भूमिका महिलाओं की सामाजिक सशक्तता को बढ़ाती है तथा स्वयं सहायता समूह समाज में एक मजबूत सामूहिक नेतृत्व का कार्य करते है।

-  जय प्रकाश पाण्डेय

Saturday, May 8, 2010

माँ - तुझे सलाम!

CitizenSBI Blog wishes its readers a Happy Mother's Day!

एक कहानी सुनी होगी आपने .... एक बेटे की प्रेमिका ने मांग की , कि मुझे तुम्हारी माँ का दिल लाकर दो । बेटे ने लाख समझाया , पर प्रेमिका जिद पर अढी रही ..... प्रेमिका के मोह में बेटे ने जंगल में अपनी माँ का वध कर डाला , माँ का दिल निकाल कर जब बेटा चलने लगा तो राह में अचानक ठोकर लगी .... माँ का दिल बोल उठा -''संभाल के बेटा ! कहीं चोट तो नहीं लगी !'' कहने को तो ये कहानी है , परन्तु ''माँ '' शब्द की व्याख्या और माँ की ममता के पराकास्ठा को दर्शाती है यानी बेटे के इतने बड़े अपराध को भी माफ़ कर दिया और देह त्यागने के बाद भी बेटे की सुरक्षा की चिंता है , जब की बेटे ने इतना बड़ा धोखा उसकी ममता को दिया ...

सच है ''माँ '' शब्द अपने आप में इतना विशाल और महान है कि माँ की ममता एवं बच्चों के लिए त्याग का वर्णन करने में शब्द भी बोने या काम पड़ जाते है , बेटे कभी माँ के लिए इतना बड़ा त्याग या बलिदान नहीं दे सकते । तमिलनाडु की एक माँ के दोनों बेटों की ऑंखें ख़राब थीं ... तो उस बेचारी माँ (तमिल सेल्वी ) ने अपनी दोनों ऑंखें दोनों बेटों को देकर बेटों की ऑंखें रोशन करने के लिए माँ ने अपना दीपक बुझा दिया , कहते है कि माँ और बेटे का दिल माँ की गर्भावस्था के दोरान समांतर धडकता है और यही साम्यता उन्हें आजीवन एक अनमोल रिश्ते में बांधकर रखती है माँ का प्यार कभी कम नहीं होता , जबकि बच्चे उस ममता और प्यार का मोल ही नहीं समझ पाते और उन्हें जीवन साथी के रूप में एक और दिल जब मिल जाता है तो इस माँ के दिल और आँखों को खून के आंसू तक रुलाने में नहीं चुकते , यदि दो बेटे है तो दोनों चाहेगे कि माँ हमारे पास नहीं रहे ... या ज्यादा हुआ तो बारी- बारी से रखेगे , या वाइफ की सलाह पर आश्रम छोड़ देते है ....

यदि हर उन्नति को आप माँ का आश्रीवाद मानते है , तो माँ को आज के युग में कबाडखाना समझकर उसकी अनुपयोगिता का अहसास पग- पग पर करते रहना आज का क्यूँ फेशन बन गया है , सिटिजन एस बी आई के माध्यम से अब माँ फिर से ''माँ '' बन कर रह पायेगी .......

-जय प्रकाश पाण्डेय
निदेशक
ग्रामीण स्वरोजगार ट्रेनिंग संस्थान , उमरिया

Wednesday, May 5, 2010

कमी नहीं है कद्र्ता की ...

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के उद्देश्य और उसके प्रति दृष्टिकोण में भिन्नता होती है। एक व्यक्ति के जीवन का उद्देश्य धनार्जन के लिए संघर्ष करना है वहीं दूसरे व्यक्ति का उद्देश्य यश और प्रतिष्ठा को प्राप्त करना है। लाखों व्यक्ति ऐसे है जो अपने संपूर्ण जीवन की दो तिहाई उम्र दोनों समय का भरपेट भोजन जुटा पाने के लिए संघर्ष करते हुए व्यतीत कर देते है। ऐसे व्यक्तियों के जीवन का उद्देश्य अपना और अपने परिवार का अस्तित्व बनाए रखने के लिए भोजन प्राप्त करना होता है। ऐसे व्यक्तियों के मन, शरीर और आत्मा की अपारशक्ति और विवेक अंत में अर्थहीन जीवन के साथ समाप्त हो जाता है ,

कुछ व्यक्ति धनी बनने की स्पर्धा में अपना समय और क्षमता नष्ट कर देते है। उनके पास जलपान और भोजन के लिए भी समय नहीं बचता। उनमें से कुछ तो ऐसे व्यक्ति भी होते है जो घर से जाते और आते समय बच्चों को सोता ही पाते है। लोग धन तो बहुत अíजत कर लेते है, किंतु उसका पूरा उपभोग किए बिना ही संसार से विदा हो जाते है। यद्यपि उनका जीवन प्रशंसनीय होता है। प्रत्येक व्यक्ति के चिंतन का प्रभाव उसकी जीवन-शैली को निर्धारित करता है। यदि भोग ही जीवन का उद्देश्य है तो फिर इतने कष्ट क्यों? इतनी प्राकृतिक विपदाएं और विविध रोग क्यों? भारतभूमि वह भूमि है, जहां धन से अधिक धर्म का और भोग से अधिक योग का महत्व है। भारतीय धारणा के अनुसार जीवन का अर्थ निरंतर संघर्ष ही है। यह संघर्ष व्यक्ति केवल अपने लिए नहीं करता, वरन् दूसरों के सुख की भी चिंता करता है। यदि व्यक्ति नदी तैरकर जा सकता है तो वह पुल बनाने की आवश्यकता अनुभव नहीं करेगा, लेकिन वह पुल बनाने की कला का प्रदर्शन करते हुए दूसरों को लाभ पहुंचाना चाहता है।

ईश्वर का सृष्टि की रचना के पीछे मानव-कल्याण के महान उद्देश्य की पूर्ती  करना है। प्रत्येक व्यक्ति और मानवता के अस्तित्व का उद्देश्य किसी-न-किसी महान लक्ष्य को प्राप्त करना है। भारतीय दर्शन के अनुसार मनुष्य की शारीरिक और मानसिक उन्नति उसकी आध्यात्मिक प्रगति पर ही आधारित है। यही उसके जीवन के शाश्वत सत्य का पथ है, एवं यही सिटिजन एस बी आई का परम सत्य है ।


-जय प्रकाश पाण्डेय
डायरेक्टर ,
ग्रामीण स्वरोजगार ट्रेनिंग संस्थान
उमरिया

Friday, April 23, 2010

'' माइक्रो - पोस्ट ''

'' मनुष्य पुरुषार्थ का पुतला है और उसकी सामर्थ्य और शक्ति का अंत नहीं है । वह बड़े से बड़े संकटों से लड़ सकता है और असंभव के बीच संभव की अभिनव किरणें उत्पन्न कर सकता है । शर्त यहीं है की वह अपने को समझे और अपनी सामर्थ्य को मूर्त रूप देने के लिए साहस को कार्यान्वित करें . ''

---किसने कहा ---आप बताएं ?

-जय प्रकाश पाण्डेय
माइक्रो फाइनेंस शाखा ,भोपाल

Thursday, April 22, 2010

सहजता, सरलता, सम्पन्नता

Teejan Bai talks about herself and her art 


तीजन बाई को सब जानते हैं। लोग कहते-लिखते हैं तीजन बाई बहुत बड़ी इंटरनेशनल फेम लोक कलाकार है। पंडवानी पर अपनी विशेष अदायगी के लिए वे पदमश्री से भी नवाजी जा चुकी हैं, पर तीजन बाई को अपनी उपलब्धियों का जरा सा भी गुरूर नहीं है। अपने बारे में, अपनी कला के बारे में और अपने देस के बारे में वे क्या सोचती हैं, जानिए उन्हीं की जुबानी…

ईमानदारी से कहूं मैं आज भी गांव की औरत हूं। सब काम करती हूं। सब्जी बनाती हूं। चटनी बनाती हूं। धान मिंजाई व ओसाई भी कर लेती हूं। आप अपने मन ही बतावो मैं कहां से बड़ी हूं। मेरे दिल में कुछ नहीं है …ऊंच-नीच, गरीब-अमीर कुछ नहीं, मैं सभी से एक जैसे ही मिलती हूं। बात करती हूं। बच्चों बूढ़ों के बीच बैठ जाती हूं। इससे दुनियादारी की कुछ बातें सीखने तो मिलती है और अनुभव भी बाढ़थे। ऎसे में कोई कुछ-कह बोल भी दे तब भी बुरा नहीं लगता। खराब छपने का भी बुरा नहीं मानती।

भोपाल के एक पत्रकार ने छापा था कि तीजनबाई डिस्को डांस के समान पंडवानी करती है, ओव्हर मेकअप करती है, ओव्हर पहनती है, वैसा लोक कलाकार को नहीं करना चाहिए। ऎसा बुरा छपने का भी बुरा नहीं लगा… पर सोचना चाहिए, आदिवासी औरतें आज भी कुछ नहीं पहनती, लुगरा पहनती हैं बिना बेलाउज के रहती है। बीड़ी फूंकती हैं, सुट्टा लगाती हैं… मैं भी पहले गांव में ऎसे ही रहती थी। लेकिन आज युग बदल गया है आज मैं जो पहन रही हूँ वह कैसे ओव्हर हो गया सलवार सूट भी तो मैंने नहीं पहनी, न पहलूंगी, साड़ी-पोलखा पहनती हूं। मेकअप का ये सामान देखो, इसमें क्या, पाउडर- क्रीम और बोरोलीन ही तो है क्या ये फुल मेकअप है! मैं पूछती हूं क्या काजर लगाना, टिकली-माहूर सजाना, मांग में सिंदूर भरना, बारों महीना हाथ पर चूडी़ पहरना कैसे ओव्हर है भाइ! मैं आज भी एक टेम बोरे बासी (रात में पका चावल पानी में डालकर) और टमामर की चटनी खाती हूं।मेरे घर में एक टेम सभी बासी खाते हैं। लोग पूछते-बोलते हैं, तीजनबाई कुछ नाश्ता किया करो तो मैं बोलती हूँ आप अपने मन का नाश्ता करते हो तो मैं बासी क्यों नहीं खा सकती क् भई, बोरे-बासी छत्तीसगढ़ का अमृत है… जौउन ला खाके हम अन जितना काम कर सकते हैं उतना दूसरा भोजन या नाश्ता करके नहीं किया जा सकता। बासी के सामने शराब का नशा भी कुछ नहीं है।

बिदेस खूब घूम डाली हूं, पर अपना देस अलग है वहाँ एक टाइप की कला है यहां विविध कलाएं हैं। मैं धार्मिक सिनेमा को छोड़कर दूसरा कोई सिनेमा भी नहीं देखती, किसी हीरो-हीरोइन को भी नहीं जानती। बचपन में जब दो रोटी भी घर में नहीं थी फिल्म कहां से देखती। पदमश्री मिलने का दिन आज भी मोर सुरता में है, वेंकटरमनजी ने दिया था। उसी दिन इंदिरा गांधी से भी मिली थी बहुत अच्छी लगी, उन्होंने मेरी पंडवानी सुनी थी। मुझे बुलाकर बोली- छत्तीसगढ़ की हो ना। मैने हाँ कहा तो इंदिरा बोली महाभारत करती हो तो मैं बोली पंडवानी सुनाती हूं महाभारत नहीं कराती, सुनकर इंदिराजी खुश हुई और मेरी पीठ थपथपाई थीं।

युग बदल गया तो मैं भी बदल गई लेकिन इतनी नहीं बदली कि लोग अंगुली उठाएं। मैं जो पहनती हूं वही पूरा छत्तीसगढ़ है, अऊ मोर छत्तीसगढ़ के ये श्रृंगार है। यह बुरा कैसे हो सकता है। रही बात डिस्को की, मैं कभी डिस्को नहीं देखती। किसी स्कूल के प्रोग्राम में चीफ गेस्ट बना देते हैं तो देखती हूं छोटे-छोटे लइका लइकी को डिस्को करते, बच्चों का डिस्को करना अच्छा लगता है पर हमारी लोककला में जो बात है वह बिदेशी नाच-गाना में नही। बिदेशी नाच में कमर जरूर हिलबे , अऊ हमार लोककला में दिल हिलबेे। लोककला के बारे में कछू कहना-लिखना आसान है। लेकिन, एला बचाने में बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। अब मेरी अपनी ही बात बताऊं पंडवानी में करांति आ गई है फिर भी मेरे अपने घर में मेरी लोककला का कोई का बस में नहीं है। अच्छी-खासी फौज है बहू-बेटा, नाती पोतों की, पर कोई भी पंडवानी से जुड़ा नहीं है। इसका मुझे कोई दुख भी नहीं है। बाहर कोई कलाकार तो होगा उसे तैयार करूंगी और अपनी कला देकर जाऊंगी, जिसमें प्रतिभा होगी। मेरे बच्चे आज वो सब कर रहे हैं जो मैं नहीं कर पाई यानी मैं एक किलास (क्लास) भी नहीं पढ़ पाई। पढ़ाई न करने का कोई दुख भी नहीं है। हो सकता है पढ़-लिख लेती तो शायद लोककला से नहीं जुड़ पाती।

प्रस्तुति -जय प्रकाश पाण्डे
माइक्रो फाइनेंस शाखा , भोपा

Wednesday, April 21, 2010

परिवर्तन का फल CITIZEN SBI



पूरे जमाने में  आज परिवर्तन का दौर चला है,
इसीलिए SBI ने आज अपना  रंग रूप बदला है.

पूरी Banking Industry में छाने का उसका कदम अगला है,
इस परिवर्तन में  जो शामिल न हो वो पगला है.

CITIZEN SBI का अंदाज अलबेला है,
सभी Employees का इस training का Experience चुलबुला है.

सलाम है ऐसी  संस्था को, जो कर्मचारी का चाहती भला है,
इसके इरादे को कोई हिला सके, ऐसी  न कोई  बला है.

Customer और कर्मचारी के सहयोग से State Bank फूला-फला है,
दो सौ साल से Number One रहने का जारी उसका सिलसिला है.

SBI मे अब हमको न कोई  शिकवा है न कोई गिला है,
क्योंकि हमको परिवर्तन और CITIZEN SBI जैसा training मिला है.

ये training  है Solid, न ये पानी का बुलबुला है,
आत्मविश्वास से भरा सबका चेहरा खिला है.

इसी training से हम में  उत्साह का नया रंग घुला है,
इसी training से हमारी सोच का नया आसमान खुला है.

परिवर्तन से हुआ है SBI में चारों ओर उजाला,
CITIZEN SBI से State Bank हुआ सबसे निराला.

- B L Raikar
Premises Officer, Regional Office -II, Surat

courtesy: colleague

Saturday, April 17, 2010

''विवेकानंद - उवाच ''

हमारी नैतिक प्रकृति जितनी उन्नत होती है, उतना ही उच्च हमारा प्रत्यक्ष अनुभव होता है, और उतनी ही हमारी इच्छा शक्ति अधिक बलवती होती है। मन का विकास करो और उसका संयम करो, उसके बाद जहाँ इच्छा हो, वहाँ इसका प्रयोग करो-उससे अति शीघ्र फल प्राप्ति होगी। यह है यथार्थ आत्मोन्नति का उपाय। एकाग्रता सीखो, और जिस ओर इच्छा हो, उसका प्रयोग करो। ऐसा करने पर तुम्हें कुछ खोना नहीं पड़ेगा। जो समस्त को प्राप्त करता है, वह अंश को भी प्राप्त कर सकता है।

पहले स्वयं संपूर्ण मुक्तावस्था प्राप्त कर लो, उसके बाद इच्छा करने पर फिर अपने को सीमाबद्ध कर सकते हो। प्रत्येक कार्य में अपनी समस्त शक्ति का प्रयोग करो। सभी मरेंगे- साधु या असाधु, धनी या दरिद्र- सभी मरेंगे। चिर काल तक किसी का शरीर नहीं रहेगा। अतएव उठो, जागो और संपूर्ण रूप से निष्कपट हो जाओ।

भारत में घोर कपट समा गया है। चाहिए चरित्र, चाहिए इस तरह की दृढ़ता और चरित्र का बल, जिससे मनुष्य आजीवन दृढ़व्रत बन सके। संन्यास का अर्थ है, मृत्यु के प्रति प्रेम। सांसारिक लोग जीवन से प्रेम करते हैं, परन्तु संन्यासी के लिए प्रेम करने को मृत्यु है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम आत्महत्या कर लें। आत्महत्या करने वालों को तो कभी मृत्यु प्यारी नहीं होती है। संन्यासी का धर्म है समस्त संसार के हित के लिए निरंतर आत्मत्याग करते हुए धीरे-धीरे मृत्यु को प्राप्त हो जाना।

प्रस्तुति: जय प्रकाश पाण्डेय
माइक्रो फाइनेंस शाखा, भोपाल

Tuesday, March 30, 2010

प्रेरणा

सदा मुस्कराना और प्यार करना
गुणी जनों का सम्मान पाना
बच्चों के दिल में रहना
सच्चे आलोचकों से स्वीकृति पाना
झूठे दोस्तों की दगाबाज़ी को सहना
खूबसूरती को हरदम सराहना
दूसरों में नई ख़ूबियाँ तलाशना
दूसरों के लिये ख़ुद को अर्पित करना
उत्साह के साथ खिलखिला कर हँसना
खेलते हुए मस्ती भरे तराने गाना
मानवता के लिए मर मिट जाना
पर सच्चे नागरिक बनना और बनाना
------०--------
( उपरोक्त खूबियाँ है श्री जगत बिस्ट में )
प्रस्तुति -
जय प्रकाश पाण्डेय

Saturday, March 27, 2010

'' सत्यम -शिवम् -सुन्दरम ''

जीवन में सत्य, शिव और सुंदर के थोड़े से बीज बोओ। यह मत सोचना कि बीज थोड़े से हैं, तो उनसे क्या होगा! क्योंकि एक बीज अपने में हजारों बीज छुपाए हुए है। सदा स्मरण रखना कि एक बीज से पूरा उपवन पैदा हो सकताहैआजकिसी ने कहा है, ''मैंने बहुत थोड़ा समय देकर ही बहुत कुछ जाना है। थोड़े से क्षण मन की मुक्ति के लिए दिये और अलौकिक स्वतंत्रता का अनुभव किया।

फूलों, झरनों और चांद-तारों के सौंदर्य-अनुभव में थोड़े-से क्षण बिताये और न केवल सौंदर्य को जाना, बल्कि स्वयं को सुंदर होता हुआ भी अनुभव किया। शुभ के लिए थोड़े-से क्षण दिये और जो आनंद पाया, उसे कहना कठिन है। तब से मैं कहने लगा कि प्रभु को तो सहज ही पाया जा सकता है। लेकिन हम उसकी ओर कुछ भी कदम न उठाने के लिए तैयार हों, तो दुर्भाग्य ही है ।

''''स्वयं की शक्ति और समय का थोड़ा अंश सत्य के लिये, शांति के लिये, सौंदर्य के लिये, शुभ के लिये दो और फिर तुम देखोगे कि जीवन की ऊंचाइयां तुम्हारे निकट आती जा रही हैं। और, एक बिलकुल अभिनव जगत अपने द्वार खोल रहा है, जिसमें कि बहुत आध्यात्मिक शक्तियां अंतर्गर्भित हैं। सत्य और शांति की जो आकांक्षा करता है, वह क्रमश: पाता है कि सत्य और शांति उसके होते जा रही हैं। और, जो सौंदर्य और शुभ की ओर अनुप्रेरित होता है, वह पाता है कि उनका जन्म स्वयं उसके ही भीतर हो रहा है।

''सुबह उठकर आकांक्षा करो कि आज का दिवस सत्य, शिव और सुंदर की दिशा में कोई फल ला सके। और, रात्रि देखो कि कल से तुम जीवन की ऊंचाइयों के ज्यादा निकट हुए हो या नहीं। गहरी आकांक्षा स्वयं में गहरी आकांक्षा पैदा करता है।

सौजन्य: ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन

प्रस्तुति: जय प्रकाश पाण्डेय
माइक्रो फाइनेंस शाखा
भोपाल

Thursday, March 25, 2010

'' आत्म-गहराई ''

सुबह कुछ लोग आए थे। उनसे मैंने कहा, ''सदा स्वयं के भीतर गहरे से गहरे होने का प्रयास करते रहो। भीतर इतनी गहराई हो कि कोई तुम्हारी थाह न ले सके। अथाह जिसकी गहराई है, अगोचर उसकी ऊंचाई हो जाती है।''जीवन जितना ही ऊंचा हो जाता है, जितना कि गहरा हो। जो ऊंचा तो होना चाहते हैं, लेकिन गहरे नहीं, उनकी असफलता सुनिश्चित है। गहराई के आधार पर ही ऊंचाई के शिखर संभलते हैं। दूसरा और कोई रास्ता नहीं। गहराई असली चीज है। उसे जो पा लेता है, उन्हें ऊंचाई तो अनायास ही मिल जाती है।
   सागर से जो स्वयं में गहरे होते हैं, हिम शिखरों की ऊंचाई केवल उन्हें ही मिलती है। गहराई मूल्य है, जो ऊंचा होने के लिए चुकाना ही पड़ता है। और, स्मरण रहे कि जीवन में बिना मूल्य कुछ भी नहीं मिलता है।स्वामी राम कहा करते थे कि उन्होंने जापान में तीन-तीन सौ, चार-चार सौ साल के चीड़ और देवदार के दरख्त देखे, जो केवल एक-एक बालिश्त के बराबर ऊंचे थे!
   आप ख्याल करें कि देवदार के दरख्त कितने बड़े होते हैं! मगर कौन और कैसे इन दरख्तों को बढ़ाने से रोक देता है?   जब उन्होंने दर्याफ्त किया, तो लोगों ने कहा हम इन दरख्तों के पत्तों और टहनियों को बिलकुल नहीं छेड़ते, बल्कि जड़ें काटते रहते हैं, नीचे बढ़ने नहीं देते। और, कायदा है कि जब जड़ें नीचे नहीं जाएंगी, तो वृक्ष ऊपर नहीं बढ़ेगा। ऊपर और नीचे दोनों में इस किस्म का संबंध है कि जो लोग ऊपर बढ़ना चाहते हैं, उन्हें अपनी आत्मा में जड़े बढ़ानी चाहिए। भीतर जड़े नहीं बढ़ेंगी, तो जीवन कभी ऊपर नहीं उठ सकता है।
   लेकिन, हम इस सूत्र को भूल गए हैं और परिणाम में जो जीवन देवदार के दरख्तों की भांति ऊंचे हो सकते थे, वे जमीन से बालिश्त भर ऊंचे नहीं उठ पाते हैं! मनुष्य छोटे से छोटा होता जा रहा है, क्योंकि स्वयं की आत्मा में उसकी जड़ें कम से कम गहरी होती जाती हैं।शरीर सतह है, आत्मा गहराई। शरीर में जो जीता है, वह गहरा कैसे हो सकेगा? शरीर में नहीं, आत्मा में जीओ। सदैव यह स्मरण रखो कि मैं जो भी सोचूं, बोलूं और करूं, उसकी परिसमाप्ति शरीर पर ही न हो जावे। शरीर से भिन्न और ऊपर भी कुछ सोचो, बोलो और करो। उससे ही क्रमश: आत्मा में जड़े मिलती हैं और गहराई उपलब्ध होती है।

सौजन्य: ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन

प्रस्तुति: जय प्रकाश पाण्डेय
माइक्रो फाइनेंस शाखा भोपाल

Tuesday, March 23, 2010

'' कर के देखो ''

मेरे प्रिय सिटिजन भाई /बहनों ,
हमारी सदेव यह अभिलाषा रहती है कि दूसरे लोग हम से प्यार करें ....... हमसे मीठा बोलें, मधुर व्यवहार करे ...., सहयोग दें .....,सहायता प्रदान करें ......, पर हमें यह भी तो सोचना चाहिए कि दूसरा भी हमसे ऐसी ही अपेक्षा रखता है । इसलिए हमारा कर्त्तव्य हो जाता है कि हम जो चाहते है पहले उसे व्यवहार में आने दे , अब उसकी प्रतिक्रिया तो स्वयमेव उत्पन्न होगी ...... ।
पुचकारने से पशु और पक्षी तक आत्मीयता प्रगट करने लगते है फिर हमको -आपको क्या कहा जाये ? हम -आप तो प्रेम के लिए , आत्मीयता के लिए अपनी झोली फेलाए फिरते है ... अरे सीधी सी बात है आप मानवता /मनुष्य से प्रेम करिए संसार आपका आभारी होगा ..... आप लोगों के साथ नेकी का व्यवहार तो कर के देखिये .... आप की भलाई का समन्दर उमड़ पड़ेगा , परोपकार के नाम पर आपका किया हुआ हर कार्य असंख्य गुना होकर लोटेगा और आपके चारों ओर सुख , शांति , और संतोष बिखर जावेगा ।

-जय प्रकाश पाण्डेय ,माइक्रो फाइनेंस शाखा ,भोपाल

Sunday, March 21, 2010

'' सच्चा देवता ''

स्त्री -पुरुषों के पास समय बिताने के लिए कोई काम न हो तो वे पतित हो जाते है । हमे काम मतलब श्रम से जी नहीं चुराना चाहिए अन्यथा हम ऐसी वस्तु बन जायेंगे जिसका प्रक्रति के लिए कोई उपयोग नहीं होगा , '' फल हीन अंजीर '' की कथा याद करो जिसमे कहा गया था कि बिना काम स्त्री -पुरुष झगड़ालू , असंतुस्ट ,अधीर और चिडचिडे हो जाते है चाहे ऊपर से वे कितने ही मीठे और मिलनसार ही क्यों न दिखाई दें , जो यह शिकायत करे कि '' मेरे पास कोई काम नहीं है '' या '' मुझसे काम नहीं बनता '' उसे झगड़ालू और शिकायत से भरा हुआ समझना चाहिए , उसके चेहरे पर थकावट -सी छाई हुई होगी ...... उसका चेहरा देखने में भला न प्रतीत हो रहा होगा ।

कई लोग ऐसा सोचते है कि उनके पास काम नहीं है तो वे भाग्यवान है या उनसे काम नहीं बनता तो वे खुशहाल है यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि काम का न होना सौभाग्य या मनचाही वस्तु है । काम न करना एक तरह से प्रक्रति के विरुद्ध -विद्रोह है ,मनुष्यता का , या पौरुष का अपमान है , यह पुर्णतः अप्राक्र्तिक और लोकिक नियमो के विपरीत है ..... अपनी रोजी -रोटी के लिए thodee कमाई कर के अपने अन्दर अहं पल लेना ......बाल -बच्चे पैदा कर के घर चला लेना क्या इतना ही पर्याप्त है इस जीवन के लिए ........ सोचो तो जरा ...... अरे भाई कुछ काम करो । कुछ काम करो .... जग में रह कर कुछ नाम करो यह जन्म हुआ कुछ व्यर्थ न हो ............ । तो कुछ तो ऐसा 'काम' कर लो जिससे पूरे विश्व के उत्थान का रास्ता प्रसस्त हो....

जिस दिन इस धरती पर श्रम और काम की कीमत गिर जायेगी उस दिन यहाँ की सारी चहल -पहल और खुशियाली मिटटी में मिल जायेगी ... अतः हमें अपने काम और श्रम के द्वारा इस संसार को बहुत सुन्दर बनाना है काम ... काम ..और श्रम ही वास्तव में असली देवता है , और यही सिटिजन एस बी आई का मूल ध्येय है .........

--जय प्रकाश पाण्डेय
माइक्रो फायनेंस शाखा
भोपाल

Tuesday, March 16, 2010

रक्तदान महादान


श्री विनोद पुरिया, स्टेट बैन्क आँफ इन्दॊर, बरोठा शाखा व्दारा सुनाये खुशी के पल

बात १९९४ की है, मै अपनी शाखा मे कार्य कर रहा था. समय लगभग ३.३० का था. तभी एक बुजुर्ग महिला बङी परेशान और रोती हुई हमारी शाखा मे आई. बैन्क का लेनदेन बन्द हो चुका था. मैने महिला से उनकी परेशानी का कारण पूछा. तब उन्होने मुझे बताया कि उनकी पुत्री कि तबियत बहुत खराब है और उसे रक्त की जरूरत है. वार्तालाप के दौरान मुझे मालूम हुआ कि उनकी पुत्री का एवम मेरा ब्लङ ग्रुप एक ही है. परन्तु मैने पहले कभी भी रक्तदान नही किया था।


उनकी बात सुनकर अचानक मेरे मन मे विचार आया कि मुझे उनकी मदद अवश्य करना चाहिये और मै जीवन मे पहली बार रक्तदान करने के लिये उनके साथ उसी समय चला गया और जीवन मे पहली बार रक्तदान किया, जिससे मुझे किसी का जीवन बचाने कि बहुत खुशी हुई जो शब्दो के माध्यम के व्यक्त करना असँभव है. इसके बाद मैने १२ अन्य लोगो को भी रक्तदान किया।

खुशी के इन पलो को सुनाते समय श्री विनोद पुरिया के चेहरे के भाव एंव आँखो मे आई चमक स्पष्ट करती है कि वे आज भी उस खुशी एंव आत्मसंतोष को मह्सूस कर रहे है.

प्रस्तुति : श्री अरुण कुमार कालवे, स्टेट बैन्क ग्यानार्जन केन्द्र, इन्दौर

Monday, March 15, 2010

A SMILE MEANS MUCH MORE THAN MONEY


I travel from Ratlam to Sailana everyday by the same bus, but that day since I was late I had to take the next bus. The whole way, on hearing the horn of the bus, I was surprised to see poor children living by the roadside, coming out and showing two fingers to the driver. In answer to this, the middle aged driver would smile and show his two fingers to them. This went on throughout the journey.

I couldn’t hold back my curiosity. I asked the driver about the secret of showing two fingers, to which he gave a shrug and replied simply that it was only the love of the children. I didn’t give up. I asked him again as to what it is that children love him so much. He smiled again. On my repeated questioning, he said that when he returns in the evening to the last stop of his bus, he gets biscuits or toffees for them. The children were asking him to get two packets of biscuits that day, by showing him two fingers.

I said, “This should be costing you a lot of money”, to which he replied, “Cost, etc, does not make a difference. I have made it a daily rule. The smile on the face of the children is greater than the money I spend on them. To me that is my greatest earnings”.

I suddenly felt a sense of joy within. No doubt, this common man had a much bigger heart than any big rich man around.

Translation: Ms. Harina, SBLC, Indore 

courtesy: Mr. Rajesh K. Rawat, NAI DUNIA